ICSE Class 10 Hindi • Sahitya Sagar (Poems) • Chapter 10
पाठ का परिचय (Introduction):
'मातृ मंदिर की ओर' सुभद्रा कुमारी चौहान जी की एक प्रसिद्ध ओजस्वी (Energetic) और राष्ट्रीय भावना (Nationalism) से प्रेरित कविता है। इस कविता में कवयित्री ने देशप्रेम को ईश्वर की भक्ति से भी बड़ा माना है। 'मातृ-मंदिर' का अर्थ यहाँ 'भारतमाता की वेदी' या देश की आज़ादी की लड़ाई से है। कवयित्री अपनी भारतमाता के मंदिर में जाकर, अपने प्राणों और रक्त की बूँदों का अर्घ्य (न्योछावर/Offering) चढ़ाना चाहती है ताकि भारत माता को अंग्रेज़ों की गुलामी से मुक्त करा सके।
शब्दार्थ: व्यथित (Vyathit) = दुखी/परेशान (Distressed); देवराज = यहाँ कवयित्री के हृदय का स्वामी या मन (Heart/Mind); अस्फुट नाद (Asphut Naad) = रहस्यमयी या धीमी सी आवाज़/पुकार (Unclear sound/call)।
प्रसंग: इस पद्यांश में कवयित्री भारतमाता की वर्तमान दुर्दशा (गुलामी) को देखकर बहुत दुखी और व्यथित है तथा मातृ-मंदिर (स्वतंत्रता संग्राम) की ओर जाने के लिए बेताब है।
व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि अपनी मातृभूमि (भारत) को अंग्रेज़ों की जंजीरों में जकड़ा हुआ
देखकर मेरा हृदय (देवराज) बहुत दुखी और बेचैन (व्यथित) है। मुझे बार-बार भारत के अतीत और उसके स्वतंत्र भारत के
गौरव की याद आ रही है।
मैं अपने व्यक्तिगत सुख और सांसारिक बातों (स्वार्थ) को पूरी तरह भूल चुकी हूँ। अब तो मेरे कानों में भारतमाता
के रोने की तेज़ और रहस्यमयी पुकार (अस्फुट नाद) गूँज रही है जो मुझे अपने पास बुला रही है। इसलिए, हे मेरे
परिवार वालों! मेरी इस पुकार को सुनो और मुझे भारत माता के मंदिर (देश सेवा) में जाने से मत रोको।
शब्दार्थ: मातृ-मंदिर = भारतमाता का मंदिर/स्वतंत्रता का रणक्षेत्र (Battlefield of freedom); रक्त-रंजित (Rakt-ranjit) = खून से सनी हुई (Blood-stained); पावन भेंट (Paavan Bhent) = पवित्र चढ़ावा/बलिदान (Holy offering/Sacrifice)।
प्रसंग: यहाँ कवयित्री ने देश सेवा के मार्ग (युद्धभूमि) को ही अपना 'मातृ-मंदिर' माना है और उसमें अपना बलिदान देने की इच्छा प्रकट की है।
व्याख्या: कवयित्री व्याकुल होकर पूछती हैं कि मेरी भारतमाता का वह महान पवित्र मंदिर
(स्वतंत्रता संग्राम की वेदी) कहाँ है? जहाँ मेरी प्यारी मातृभूमि बंदी है, मैं उसी मंदिर में जाऊँगी।
आम लोग जब मंदिर जाते हैं तो फूल-प्रसाद चढ़ाते हैं, लेकिन कवयित्री कहती हैं कि मैं बहुत गरीब हूँ, मेरे पास
भारत माता को चढ़ाने के लिए कोई मूल्यवान वस्तु हीं है। मैं नहीं जानती कि मैं मंदिर में क्या अर्पण करूँगी।
इसलिए मैंने निश्चय किया है कि मैं उन अंग्रेज़ों से लड़ते हुए अपने सीने पर गोली खाऊँगी और अपने शरीर के पवित्र
खून से सनी हुई (रक्त-रंजित) अपने 'प्राणों की पावन भेंट' (बलिदान) ही अपनी भारत माता के चरणों में चढ़ाऊँगी।
शब्दार्थ: संगी-साथी = मित्र/देशवासी (Companions/Countrymen); सोने वालों = अज्ञान और ग़ुलामी में सोए हुए भारतीयों; पूत = पुत्र/बेटे (Sons)।
प्रसंग: इस अंतिम पद्यांश में कवयित्री अज्ञान और निराशा की नींद में सोए हुए भारतीयों को स्वतंत्रता की लड़ाई में कूदने के लिए जाग्रत (Awaken) कर रही हैं।
व्याख्या: कवयित्री अकेले ही बलिदान नहीं देना चाहतीं। वे पूरे देशवासियों को जगाते हुए कहती
हैं— "हे मेरे संगी-साथियों और देशवासियों! आओ। हे अज्ञान, निराशा और ग़ुलामी की गहरी नींद में सोने वालों! अब
तो उठो।
हे भारतमाता के वीर पुत्रों (पूत)! अब जाग जाओ (जागो)। तुम और कब तक इस अपमान और पराधीनता (Slavery) की नींद में
सोते रहोगे? अपनी भारत माता के दर्द को समझो और अंग्रेज़ों के खिलाफ उठ खड़े हो। आओ, हम सब मिलकर इस
'मातृ-मंदिर' की ओर चलें और अपने खून से भारत माता को स्वतंत्र कराएँ।"
प्रश्न 1: कवयित्री ने 'मातृ मंदिर' किसे कहा है और उनका देवराज व्यथित क्यों है?
उत्तर: कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने 'मातृ मंदिर' अपनी जन्मभूमि
'भारत' को कहा है (विशेषकर भारत के उस स्वतंत्रता संग्राम के मैदान को जहाँ स्वतंत्रता-सेनानी अपना बलिदान
दे रहे थे)।
कवयित्री का 'देवराज' यानी उनका 'हृदय' इसलिए बहुत व्यथित (परेशान और दुखी) है क्योंकि वे अपनी प्यारी भारत
माता को अंग्रेज़ों की ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ, उनका शोषण और अपमान होते हुए देख रही हैं। भारत के इस खोए
हुए गौरव और आज की ग़ुलामी को देखकर उनका मन अत्यधिक बेचैन है।
प्रश्न 2: कवयित्री मातृ-मंदिर में क्या 'भेंट' (चढ़ावा) चढ़ाना चाहती हैं और क्यों?
उत्तर: सामान्य लोग ईश्वरीय मंदिर में फूल, फल या मिठाई चढ़ाते हैं, लेकिन कवयित्री 'मातृ-मंदिर' (देश रक्षा के मैदान) में 'रक्त-रंजित' (अपने खून से सनी हुई) अपने प्राणों (बलिदान) की पावन भेंट चढ़ाना चाहती हैं। वह ऐसा इसलिए करना चाहती हैं क्योंकि भारत माता को अंग्रेज़ों की ग़ुलामी से मुक्त कराने के लिए किसी साधारण प्रसाद की नहीं, बल्कि देश के वीर नौजवानों के सीने पर खाई हुई गोलियों और उनके पवित्र खून (रक्त) के बलिदान की आवश्यकता है। यही उनके लिए सबसे पवित्र (पावन) चढ़ावा है।
प्रश्न 3: "उठो, सोने वालों! अब जागो, ओ भारत के पूत" – इस पंक्ति द्वारा कवयित्री किसे और क्यों जगाना चाहती हैं?
उत्तर: इस पंक्ति के माध्यम से कवयित्री भारत के उन नौजवानों और
देशवासियों को जगाना चाहती हैं जो अज्ञान, निराशा, स्वार्थ और ग़ुलामी (पराधीनता) की गहरी 'नींद' में सोए
हुए थे। जो अंग्रेज़ों के अत्याचार को चुपचाप सहते जा रहे थे।
कवयित्री उन्हें इसलिए जगाना चाहती हैं (जागो ओ भारत के पूत) ताकि वे उठें, अपनी मातृभूमि (भारत माता) के
दर्द और उसकी पुकार को सुनें, और अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को छोड़कर 'मातृ-मंदिर' (स्वतंत्रता संग्राम) की
ओर चलें। वह चाहती हैं कि पूरा देश एकजुट होकर देश की आज़ादी के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान देने को तैयार हो
जाए।